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नैटेरिव संभालने के लिए?

भाजपा देश भर में ‘तिरंगा यात्रा’ निकाल रही है। इस दौरान भाजपा कार्यकर्ता ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के बारे में बताएंगे। वे क्या बोलेंगे, यानी उनके टॉकिंग प्वाइंट्स क्या होंगे, उसका संकेत प्रधानमंत्री ने अपने राष्ट्र के नाम संबोधन में दिया।

सत्ता पक्ष को शायद अहसास है कि बीते 11 साल में पहली बार ऐसा हुआ है, जब राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर कथानक उसके साथ से फिसल गया है। ऑपरेशन सिंदूर के सिलसिले में अचानक हुए युद्धविराम पर उससे ऐसे हलकों से भी सवाल पूछे जा रहे हैं, जो आम तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में सत्ताधारी समूह के नजरिए से इत्तेफ़ाक रखते हैं। संभवतः इसी अहसास का नतीजा है कि सोमवार को अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्र के नाम संबोधन का कार्यक्रम बना और साथ ही खबर आई कि 13 से 23 मई तक भारतीय जनता पार्टी देश भर में ‘तिरंगा यात्रा’ निकालेगी।

इस यात्रा के दौरान भाजपा कार्यकर्ता लोगों को ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के बारे में बताएंगे। वे क्या बोलेंगे, उसका संकेत प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में दिया। बल्कि ये कहा जा सकता है कि उन्होंने ‘तिरंगा यात्रा’ में जाने वाले कार्यकर्ताओं को टॉकिंग प्वाइंट्स दिए। सार यही होगा कि ऑपरेशन सिंदूर के जरिए “पाकिस्तान के सीने पर वार” किया गया और वहां आतंक के ढांचे को नष्ट कर दिया गया है। इससे घबराए पाकिस्तान ने (डीजीएमओ के जरिए) जब भारत से संपर्क किया और वादा किया कि आगे वहां आतंक को संरक्षण नहीं दिया जाएगा, तब युद्धविराम के जरिए भारत ने पाकिस्तान को “एक मौका दिया है”।

मगर ये बातें गले नहीं उतरतीं, क्योंकि दस मई के बाद से उठे कई अहम सवालों के जवाब प्रधानमंत्री के भाषण से नहीं मिले। मसलन, युद्धविराम कराने में अमेरिका की क्या भूमिका रही, क्या भारत तटस्थ स्थल पर पाकिस्तान से बातचीत के लिए राजी हुआ है, क्या साढ़े तीन तीन की कार्रवाई के दौरान भारत को लड़ाकू विमानों का नुकसान हुआ, और इस पूरे प्रकरण में- चाहे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद हो या आईएमएफ बोर्ड- भारत दुनिया में अकेला खड़ा क्यों नजर आया? प्रधानमंत्री ने कहा कि टेरर और टॉक साथ-साथ नहीं हो सकते, लेकिन लगे हाथ यह संकेत भी दिया कि भारत पाकिस्तान से आतंकवाद और पीओके के सवाल पर वार्ता के लिए तैयार है। तो कुल मिलाकर प्रश्न अनुत्तरित रहे। नैरेटिव का क्या होगा, यह अलग सवाल है।

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